आज मैं छत पर टहल रहा था। सामान्यतः यह मेरी दिनचर्या है। मैं रोज खाना खाने के बाद प्रातः व शाम को छत पर टहलने जाता हूं। रोज की तरह आज भी टहल रहा था तो मेरी नजर छत पर एक धागे पर पड़ी। मैंने गौर से देखा तो पता चला कि यह कटे हुए पतंग का धागा है फिर क्या मैं अपने बचपन में खो गया। वह भी क्या दिन थे जब भी मैं किसी उड़ते हुए पतंग को देखा करता था तो मैं भगवान से मनाता था भगवान मुझे उड़ने की शक्ति दे दो जिससे मैं उड़कर जितने भी पतंग आसमान में उड़ रहे हैं इनको मैं तोड़ लूँ या फिर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लूट लूँ। कभी-कभी तो मैं यहां तक सोच लेता था भगवान मुझे ऐसी शक्ति दे दो जिससे मैं आसमान में बहने वाली हवा का रुख अपने घर की तरफ कर दूँ ताकि जो भी पतंग टूटे वह मेरे छत पर आ कर गिरे इस प्रकार के अनावश्यक ख्यालों में खोया रहता था। आज छत पर टहलते हुए मुझे इस चीज का आभास हुआ कि मैं कितना गलत था। शायद इसी को कहते हैं बचपना। आदमी सोचता है कि वह सही सोच रहा है लेकिन वास्तव में उसकी सत्यता तब पता चलती है जब वह समझदार हो जाता है। बचपन में मैं जो भी सोचता था उससे मुझे लगता था कि मैं सही सोच रहा हूं लेकिन वास्तव में मैं ऐसी बातें सोच रहा था जिसका कोई अर्थ ही नहीं था जिसकी कोई जरूरत ही नहीं थी और वास्तव में अगर ऐसा हो भी जाता है तो इतने ढेर सारे पतंगों का मैं क्या करता? आज के दिन वह पतंग मेरे लिए किसी काम के नहीं थे बहुत ज्यादा करता तो उन पतंगों को बच्चों के बीच बांट देता जिससे वे दिन भर पतंग उड़ाते रहते और एक प्रकार से देखा जाए तो मैं उनका जीवन बर्बाद करता। या दूसरे शब्दों में देश के विकास में बाधा डालता। मैंने यह कहानी आज आप लोगों को क्यों सुनाई? उसका एक कारण है क्योंकि मैं जिस ज्ञान की चर्चा आपसे करना चाहता हूं अगर मैं उसे आपको सहसा बता देता तो शायद आप उसे इतने अच्छे से न समझ पाते। मुझे लगा मेरे बचपन की इस घटना से आप मुझसे ज्यादा अच्छे से जुड़ सकते हैं और मेरी बात समझने में आपको कुछ मदद मिलेगी। इसीलिए मैंने यह कहानी आपको बताई। अब आते हैं निष्कर्ष पर।
निष्कर्ष यह निकलता है कि हम एक उम्र में जो भी सोचते हैं हमारे अनुसार तो वह सही होता है, लेकिन वास्तव में वह सही है या गलत है इसके बारे में सोचने की शक्ति इस बात पर निर्भर करती है हमने कितना ज्ञानार्जन किया है। हमारी सोच गलत भी हो सकती है। इसलिए हमें कोई भी निर्णय करने से पहले उसके विषय पर किसी ने किसी समझदार व्यक्ति या अपने बड़ों से चर्चा कर लेनी चाहिए क्योंकि जैसा कि मैंने इस कहानी में बताया है कि मैं पतंग के बारे में जो भी सोचता था वह मेरी उस उम्र में तो सही था अर्थात उस उम्र के अनुसार तो सही था लेकिन वास्तव में वह तर्कसंगत नहीं था।
इससे एक निष्कर्ष और निकलता है कि एक उम्र मैं हम जिस चीज की कामना करते हैं हो सकता है कि उस समय वह वस्तु मूल्यवान लेकिन उसकी आगे जरूरत ना हो। अगर मुझे उस समय पतंग लाखों की संख्या में मिल जाते तो मेरे लिए वह एक खजाने से कम नहीं था लेकिन आज उन पतंगों की कीमत मेरे लिए कुछ नहीं है भले मुझे यह करोड़ों में मिल जाए। इसलिए समय के अनुसार स्वर्ण में परिवर्तन करते रहें और उन परिवर्तनों को महसूस करें।